अयोध्या न्यूज डेस्क: अयोध्या में राम मंदिर दान चोरी मामले को लेकर वकीलों की संस्था 'अयोध्या बार एसोसिएशन' द्वारा लिया गया एक फैसला इस समय पूरे देश के कानूनी गलियारों में बड़ी बहस का विषय बन गया है। बार एसोसिएशन ने प्रस्ताव पारित कर घोषणा की है कि उनका कोई भी वकील इस मामले के 8 आरोपियों का केस नहीं लड़ेगा। साथ ही यह चेतावनी भी दी गई है कि यदि किसी वकील ने इस फैसले की अनदेखी कर आरोपियों का केस हाथ में लिया, तो उस पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा।
इस फैसले ने देश के कानूनी इतिहास के एक बेहद पुराने और गंभीर सवाल को फिर से जिंदा कर दिया है: क्या कोई वकील कानूनी सिद्धांतों के ऊपर अपनी या समाज की नैतिकता को रख सकता है? क्या न्याय की बुनियादी परिभाषा यह मांग नहीं करती कि हर आरोपी को अपनी बात रखने के लिए एक वकील मिलना ही चाहिए?
देश के जाने-माने वरिष्ठ वकीलों और सुप्रीम कोर्ट के कानूनी विशेषज्ञों ने 'एनडीटीवी' (NDTV) से बातचीत में इस पर अपनी बेबाक राय रखी है। इस गंभीर कानूनी और नैतिक बहस के मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं:
संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन: कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अयोध्या बार एसोसिएशन का यह सामूहिक फैसला संवैधानिक सीमा को पार करता है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 (Article 21) हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें निष्पक्ष सुनवाई और अपनी पसंद के वकील द्वारा बचाव का अधिकार शामिल है। कानूनन, जब तक अपराध सिद्ध न हो जाए, हर आरोपी को निर्दोष माना जाता है और उसे दोषी साबित करने का जिम्मा पूरी तरह अभियोजन पक्ष (Prosecution) पर होता है।
क्या है 'कैब रैंक रूल' (Cab Rank Rule): सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने समझाया कि वकीलों का काम जनभावना या सामाजिक संवेदनाओं से नहीं, बल्कि "कानूनी नैतिकता" से चलता है। वकीलों के लिए 'कैब रैंक रूल' लागू होता है—यानी जैसे एक खाली टैक्सी स्टैंड पर खड़ा ड्राइवर किसी भी सवारी को ले जाने से मना नहीं कर सकता, ठीक वैसे ही अगर कोई क्लाइंट (मुवक्किल) वकील के पास आता है, फीस देने में सक्षम है और हितों का कोई टकराव (Conflict of interest) नहीं है, तो वकील को उसका केस स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सामूहिक रूप से किसी का बहिष्कार करना बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों के खिलाफ है। यदि वहां कोई वकील केस नहीं लड़ता, तो निष्पक्ष सुनवाई के लिए इस ट्रायल (मुकदमे) को जिले या राज्य से बाहर ट्रांसफर भी किया जा सकता है।
व्यक्तिगत नैतिकता बनाम संवैधानिक नैतिकता: सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने इस विवाद को एक अलग नजरिए से देखा। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति के तौर पर कोई भी वकील किसी जघन्य अपराध से घृणा कर सकता है और व्यक्तिगत तौर पर उस केस को लड़ने से मना कर सकता है। यह उसकी "व्यक्तिगत नैतिकता" है। लेकिन संविधान किसी भी बार एसोसिएशन को यह अधिकार नहीं देता कि वह सामूहिक रूप से प्रतिबंध (Embargo) लगाकर किसी आरोपी को कानूनी सहायता से पूरी तरह वंचित कर दे। यदि सभी वकील मना कर देंगे तो ट्रायल आगे नहीं बढ़ पाएगा और ऐसी स्थिति में कोर्ट को खुद सरकारी खर्च पर कानूनी सहायता (Legal Aid) देनी होगी।
तकनीकी खामी का फायदा उठा सकते हैं आरोपी: सुप्रीम कोर्ट के वकील आदित्य गिरी ने एक बेहद जरूरी तकनीकी पहलू की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि आरोपियों को वकील न देना या उनके अधिकार को दबाना कानूनी प्रक्रिया में एक बड़ी खामी (Procedural Defect) छोड़ देता है। अगर बिना वकील के उन्हें सजा सुना भी दी जाए, तो बाद में ऊपरी अदालत (Appellate Court) में अपील के दौरान इसी तकनीकी खामी का फायदा उठाकर आरोपी सजा से बच सकते हैं। इसलिए न्याय की पूर्णता के लिए निष्पक्ष सुनवाई बेहद जरूरी है।
राम जेठमलानी और इतिहास की मिसालें: भारत के दिग्गज क्रिमिनल लॉयर दिवंगत राम जेठमलानी ने हमेशा इस सिद्धांत की वकालत की थी। उनका एक प्रसिद्ध कथन है—"कोई वकील जो किसी व्यक्ति का बचाव सिर्फ इसलिए करने से मना कर देता है क्योंकि लोग उसे दोषी मानते हैं, वह खुद पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) का दोषी है।" देश का इतिहास गवाह है कि 26/11 मुंबई आतंकी हमले के दोषी अजमल कसाब और 'निर्भया' सामूहिक दुष्कर्म व हत्या जैसे मामलों में, जहां देश भर में भारी जन-आक्रोश था, वहाँ भी न्याय प्रणाली की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए आरोपियों को कानूनी प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया था।
कानूनी बिरादरी के वरिष्ठ सदस्यों का स्पष्ट मानना है कि यह बहस किसी आरोपी के प्रति सहानुभूति की नहीं है, बल्कि यह देश में कानून के शासन (Rule of Law) और हमारी न्याय प्रणाली की गरिमा व अखंडता को अक्षुण्ण रखने की है।