अयोध्या न्यूज डेस्क: अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण और रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अब प्राचीन कालेराम मंदिर एक बार फिर चर्चा में है। मंदिर से जुड़े इतिहास के अनुसार, यही वह स्थान है जहां श्रीरामजन्म भूमि पर मुगल आक्रमण के दौरान भगवान राम के मूल विग्रह को सुरक्षित रखकर स्थापित किया गया था। बताया जाता है कि उज्जैन नरेश महाराज विक्रमादित्य द्वारा बनवाए गए प्राचीन राम मंदिर को आक्रांताओं ने ध्वस्त कर दिया था, जिसके बाद तत्कालीन पुजारी श्यामानंद ने भगवान के विग्रह को अपमान से बचाने के लिए सरयू नदी में प्रवाहित कर दिया था।
कालेराम मंदिर के व्यवस्थापक गोपाल राव देशपांडे के अनुसार, महाराज विक्रमादित्य ने श्रीरामजन्म भूमि सहित पांच प्रमुख मंदिरों का निर्माण कराया था और उन सभी मंदिरों के विग्रह एक ही प्रकार के पाषाण खंड से निर्मित हैं। उन्होंने बताया कि बड़ी देवकाली मंदिर, कनक भवन, ओरछा के रामराजा मंदिर, राजगद्दी और लक्ष्मण घाट स्थित शेषावतार मंदिर के विग्रह भी उसी कालखंड के माने जाते हैं। हालांकि राम मंदिर के कानूनी विवाद के दौरान कालेराम मंदिर प्रबंधन की ओर से कोई औपचारिक गवाही नहीं दी गई थी।
मंदिर के इतिहास के मुताबिक, 18वीं सदी में महाराष्ट्र के संत नरसिंह राव मोघे को सरयू नदी से यह पंचायतन विग्रह प्राप्त हुआ था। कहा जाता है कि उन्हें लगातार तीन बार स्वप्न में आदेश मिला, जिसके बाद उन्होंने विग्रह को सरयू से निकालकर मंदिर का निर्माण कराया और स्थापना की। वर्तमान में मंदिर की व्यवस्था आठवीं पीढ़ी के आचार्य संभाल रहे हैं। मंदिर प्रबंधन का दावा है कि छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरु समर्थ गुरु रामदास और महाराष्ट्र के संत गोंदवलेकर महाराज भी यहां दर्शन के लिए आए थे।
मंदिर के व्यवस्थापक राघवेन्द्र देशपांडे ने बताया कि जब संत मोघे महाराज को सरयू से विग्रह मिला तो उनके मुख से स्वतः “कालेराम” शब्द निकला, जिसके बाद मंदिर का नाम कालेराम मंदिर पड़ा। इस एक ही शिलाखंड में भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और हनुमान जी विराजमान हैं, इसलिए इसे पंचायतन विग्रह कहा जाता है। मंदिर में गंगा दशहरा पर पारंपरिक फूल बंगला सजाया जाएगा और तीन जून से पुरुषोत्तम मास के अवसर पर श्रीरामचरितमानस का नवाह्न पारायण एवं रामकथा का आयोजन भी किया जाएगा।