अयोध्या न्यूज डेस्क: अयोध्या के रहने वाले मोहम्मद शरीफ की जिंदगी एक दर्दनाक घटना के बाद पूरी तरह बदल गई। साल 1992 में उन्होंने अपने बेटे रईस खान को खो दिया, लेकिन सबसे बड़ा दुख यह था कि उन्हें बेटे का अंतिम संस्कार करने का अवसर भी नहीं मिला। इस गहरे सदमे ने उनके भीतर एक ऐसी सोच पैदा की, जिसने उनकी जिंदगी को इंसानियत की मिसाल बना दिया।
अपने दर्द को ताकत बनाते हुए उन्होंने ठान लिया कि अब कोई भी व्यक्ति लावारिस हालत में इस दुनिया से विदा नहीं होगा। इसके बाद वह पुलिस थानों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों और मुर्दाघरों में जाकर ऐसे शवों की तलाश करने लगे, जिन्हें कोई अपनाने वाला नहीं होता था। 72 घंटे तक इंतजार के बाद यदि कोई परिजन नहीं मिलता, तो वह खुद आगे बढ़कर उस व्यक्ति के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाते।
मोहम्मद शरीफ ने यह काम बिना किसी भेदभाव के किया। वह हर धर्म और परंपरा का सम्मान करते हुए मृतकों का अंतिम संस्कार करते—हिंदू होने पर दाह संस्कार और मुस्लिम होने पर दफनाने की व्यवस्था करते। धीरे-धीरे लोग उन्हें “शरीफ चाचा” के नाम से जानने लगे, जो इंसानियत को सबसे ऊपर रखते हैं और हर अनजान व्यक्ति को भी सम्मानजनक विदाई देते हैं।
उनकी वर्षों की निस्वार्थ सेवा को देश ने भी सराहा और उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया। यह सम्मान राष्ट्रपति भवन में प्रदान किया गया, जो उनके समर्पण और मानवता के प्रति उनके योगदान का प्रमाण है। उनकी कहानी आज भी यह संदेश देती है कि सच्ची इंसानियत वही है, जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के लिए जीती है।