अयोध्या न्यूज डेस्क: उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने 70 जिलाध्यक्षों के नामों की घोषणा कर दी है, लेकिन अब भी 28 जिलों में अध्यक्षों के नाम तय नहीं हो सके हैं। पार्टी के अंदरूनी मतभेद और गुटबाजी के कारण इस प्रक्रिया में देरी हो रही है। सांसदों और विधायकों के बीच सहमति न बनने के चलते जिलाध्यक्षों की दूसरी सूची जारी नहीं हो पाई है। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि सभी नियुक्तियां सर्वसम्मति से हों, ताकि आंतरिक कलह से बचा जा सके, लेकिन कई जिलों में स्थानीय नेताओं के बीच विवाद इस प्रक्रिया में बाधा बन रहे हैं। इससे न सिर्फ जिलाध्यक्षों की घोषणा रुकी हुई है, बल्कि प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर भी कुछ अहम पदों की नियुक्ति लंबित है।
बीजेपी के प्रदेश चुनाव अधिकारी डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय के संसदीय क्षेत्र चंदौली में अभी तक जिलाध्यक्ष तय नहीं हुआ है, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में तीन दावेदारों के बीच टकराव की वजह से मामला उलझा हुआ है। अलीगढ़, हाथरस, एटा, पीलीभीत समेत कई जिलों में भी यही स्थिति बनी हुई है। फतेहपुर में तो मामला और भी गंभीर हो गया है, जहां जिलाध्यक्ष पद के एक दावेदार पर घूस लेने के आरोप लगने के बाद उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई। इस तरह पश्चिमी यूपी, बुंदेलखंड और पूर्वी यूपी के कई जिलों में अब भी नियुक्तियां अटकी हुई हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच समाजवादी पार्टी अपने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) वोट बैंक को मजबूत करने में जुटी है, और बीजेपी इस रणनीति की काट जिलाध्यक्षों के जरिए निकालने की कोशिश कर रही है। हालांकि, पार्टी के आंतरिक विवादों ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका दे दिया है। फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि बीजेपी की दूसरी सूची कब जारी होगी, लेकिन अगर सांसदों और विधायकों के बीच सहमति नहीं बनती है, तो केंद्रीय नेतृत्व को सीधे हस्तक्षेप करना पड़ सकता है।