अयोध्या न्यूज डेस्क: हमारे आसपास कई चीजें ऐसी होती हैं, जिनका जुड़ाव पुराने समय की परंपराओं से होता है। इन्हीं में से एक है ‘लोहे की मुंदरी’, जिसे अवध क्षेत्र में लोहे की अंगूठी के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन काल से जाति से ज्यादा कर्म को महत्व दिया जाता रहा है, और इसी सोच के साथ सुल्तानपुर के अयोध्या प्रसाद आज भी अपने पुश्तैनी काम को संभाले हुए हैं। वह पारंपरिक तरीके से लोहे के आभूषण बनाकर आजीविका चला रहे हैं और अपनी कला को जिंदा रखे हुए हैं।
लोहे की मुंदरी बनाने की प्रक्रिया भी काफी दिलचस्प होती है। पहले लोहे की एक पतली रॉड को आग में तपाया जाता है, फिर इसे उंगली के आकार के एक लोहे के सांचे पर 360 डिग्री घुमाया जाता है। सही आकार में आने के बाद इसे काटकर अंतिम रूप दिया जाता है। यह मुंदरी हर उंगली के अलग-अलग साइज में बनाई जाती है, ताकि हर किसी के लिए उपयुक्त हो।
अयोध्या प्रसाद बताते हैं कि यह काम उनके परिवार में पीढ़ियों से चला आ रहा है। उनके दादा और पिता भी इसी काम में लगे थे। खास बात यह है कि वे अपनी बनाई हुई मुंदरी बाजार में बेचने नहीं जाते, बल्कि लोग खुद उनके पास इसे खरीदने आते हैं। इससे न सिर्फ उनकी कमाई अच्छी हो रही है, बल्कि यह परंपरागत कारीगरी भी जीवित बनी हुई है।