अयोध्या न्यूज डेस्क: मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला परिसर को लेकर विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। इंदौर खंडपीठ द्वारा 15 मई को दिए गए 242 पन्नों के फैसले में परिसर को हिंदू मंदिर घोषित किए जाने के बाद राज्य की राजनीति और कानूनी हलकों में हलचल तेज हो गई है। फैसले के तुरंत बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इसे ऐतिहासिक बताते हुए परिसर में “भव्य मंदिर” निर्माण की बात कही।
हालांकि भोजशाला-कमाल मौला परिसर अभी भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की निगरानी में है, लेकिन अदालत के फैसले के बाद वहां धार्मिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। पूरे परिसर को बैनर, पताकाओं और गेंदे के फूलों से सजाया गया है और प्रतिदिन पूजा-अर्चना की जा रही है। हिंदू संगठनों ने इसे अपनी बड़ी जीत बताया है, जबकि मुस्लिम पक्ष ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है।
मुस्लिम पक्ष का कहना है कि हाईकोर्ट ने पूजा स्थल अधिनियम 1991 की व्याख्या चयनात्मक तरीके से की है और संवैधानिक पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कमाल मौला मस्जिद समिति विशेष अनुमति याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं। मुस्लिम पक्ष के वकीलों का दावा है कि एएसआई की रिपोर्ट और ऐतिहासिक तथ्यों को पूरी तरह संतुलित तरीके से नहीं देखा गया।
वहीं हिंदू संगठनों का कहना है कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है और वे सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार करेंगे। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचेगा, जहां यह तय होगा कि हाईकोर्ट का फैसला पूजा स्थल अधिनियम 1991 और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है या नहीं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि धार विवाद की तुलना अयोध्या मामले से करना जल्दबाजी होगी, क्योंकि दोनों मामलों की कानूनी परिस्थितियां अलग हैं।